Saturday, November 14, 2009

"सारे जहां से अच्छा हिन्दोसितां हमारा, हम बुलबुले हैं इसके, ये गुलसितां हमारा"




















14 नवम्बर " बाल दिवस" विशेष
आज हमारे गुलसितां को कीड़ा लग गया है । कीड़े लगे पौधे कभी स्वस्थ वृक्ष नहीं बन सकते, न हीं स्वस्थ पर्यावरण दे सकते ।
यही बात हमारे उन नन्हे बेकसूर बाल मज़दूरों के लिए भी लागू होती है । कहते हैं किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों पर निर्भर करता है और जब राष्ट्र के भविष्य का वर्तमान ही अंधकार में हो तो मन कड़्वाहट से भर जाता है । यह हम ही नहीं कह रहे बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार समिति द्वारा किया गया सर्वेक्षण बता रहा है ।
आज विश्व में लगभग ११ करोड़ बाल मज़दूर हैं । जो अत्यन्त भयावह परिस्थितियों से गुज़र रहे हैं । समिति की रिपोर्ट से सामने आया कि किस प्रकार से विश्व के अविकसित राष्ट्रों में बच्चों का शोषण हो रहा है और उन्हें अपना और अपने मां बाप का पेट भरने के लिए जानवरों से भी बदतर ज़िन्दगी बसर करनी पड़ रही है । इस तरह के ९७ % बाल मज़दूर तीसरे विश्व में अर्थात अविकसित राष्ट्रों में हैं । जिन राष्ट्रों में अशिक्षा एंव कुपोषण ज्यादा है वहीं इनकी मात्रा ज्यादा पायी गई ।
हमारे देश में ३० करोड़ बच्चों में से लगभग ४.५ करोड़ बच्चे अब तक मज़दूर बन चुके हैं और विभिन्न प्रकार के धंधों में लगे हुए हैं । दूसरे शब्दों में हमारे देश का हर सातवां बच्चा बाल मज़दूर की श्रेणी में आता है । इनका बचपन छीन कर कौन इन्हें मज़दूर बनाता है । गरीबी अपने आप में एक बीमारी है जहां भुखमरी,कुपोषण, अशिक्षा, के नाग हर तरफ फन फैलाए बैठे हुए हैं । कौन इन बीमारों
को और बीमार बना रहा है , मौत के मुंह में डाल रहा है , जघन्य अपराधिक प्रवृतियों में लिप्त होने को मज़बूर कर रहा है । परिस्थितियां, परिवेश या यह समाज़ ! अपना बच्चा हर किसी की आंख का तारा होता है फिर दूसरे के साथ ऐसा अमानवीय कृत्य क्यों किया जा रहा है ?
केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के अनुसार इस समय देश के सभी क्षेत्रों और सेवाओं में कार्यरत बाल मज़दूरों में से ६३ % किशोर, २२ % उससे कम उम्र के और शेष मासूम बच्चे हैं । बाल मज़दूरों की संख्या सभी राज्यों में मौज़ूद हैं , सबसे अधिक आंध्रप्रदेश इसके बाद मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र,उत्तर प्रदेश,बिहार, कर्नाटक एंव राजस्थान व पश्चिम बंगाल मे हैं । छोटे बच्चे भगवान के प्रतिरूप माने जाते हैं मगर यह भगवान ही मज़बूर हो बर्तन मांज़ते हुए मज़दूर में रूपांतरित हो जाते हैं । ये बच्चे कैसा कैसा काम नहीं करते ,क्या क्या नहींसहते । मुम्बई के बाल मज़दूर जूते साफ करने,होटलों में बर्तन धोने , कार साफ करने, कूढ़ा बीनने आदि का काम करते हैं । इनमें से २५ % बच्चे ६ से ८ वर्ष के , ५० % १० से १२ वर्ष के एंव शेष २५ % १३ से १५ वर्ष के होते हैं । यूनीसेफ के एक सर्वेक्षण से पता चला है कि अकेले भारत में ही दो करोड़ बच्चों को अपना जीवन यापन करने के लिए दिनभर काम करना पड़्ता है । ये बच्चे अव्यवस्थित व्यवसायों में लगे हुए हैं जहां इनके मालिक इनका शोषण करते हैं । ये बच्चे पूरी तरह इनके मालिकों की दया पर जीते हैं । अधिक शारीरिक श्रम और मार खाना इनकी नियति है ।
इंदौर को ही ले लें यहां एक लाख से ज्यादा बाल श्रमिक हैं जिनका बचपन काम के तले कुचला जारहा है । यही नहीं इंदौर तो बाल श्रमिकों की मन्डी में तब्दील हो गया है । बाल श्रम को रोकने के लिए शासन की जवाबदेह्री नगण्य कही जा सकती है क्योंकि प्रदेश के १७ जिलों में तो श्रम विभाग के दफ्तर ही नहीं है जबकि इंदौर श्रम विभाग का मुख्यालय है । ज्यादातर बच्चे बाहर प्रदेशों से लाए जाते हैं ताकि वे स्थायित्व से रह सकें । अत्यन्त गरीब परिवार के इन बच्चों का रहना व खाना प्रतिष्ठा
न में ही होता है । काम लेने वाले बच्चों के खाते में कुछ पैसे डाल देते हैं या उनके मां बाप तक पहुंचा देते हैं । बच्चों के हाथ पैसा भी नहीं रहता और उनसे जमके काम लिया जाता है कमी होने पर मार तक खाते हैं । सोचिए परिस्थितियां बच्चों से किस तरह का काम करवाती हैं और गरीबी का क्या आलम रहता है जो इन्हें ठेके पर कचरा बीनना, शादियों के दौरान सिर पर झूमर रखकर चलना,चाय ठेला, होटल, गैरज,खदान,सब्ज़ीमन्डी,रेलवे स्टेशन,फुटकर व्यापारियों के यहा एंव जूता पौलिश व हम्माली जैसे कार्य करते हैं । जिनके हाथ में स्लेट -पेंसिल वर्ण माला लिखने के लिए होनी चाहिए थी वे स्लेट पत्थर ढोरहे हैं ।
यही कहानी है अफीम की मादकता से सराबोर मंदसौर जिले के स्लेट पेंसिल उधौग की जहां दस हज़ार से भी अधिक मज़दूर सिलिकोसिस रोग से पीड़ित नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं । यहां के कारखाना मालिकों की धन कमाओ वृत्ति बढ़्ती जाने का कारण अफीम से उपलब्ध राजस्व से अधिक स्लेट पेंसिल उधौग से राजस्व पाना है ।
अब तो हर चीज से डर लगने लगा है , बाज़ारवाद के चलते अपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए उपयोग में लाए जाने वाले बच्चों की सिसकियां , खून व पसीने के साथ घूटती आहें सुनाई देने लगती हैं । क्या आप जानते हैं कि यूरोप में पसंद किए जाने वाले कश्मीरी कालीन निर्यात कर, व्यापारी इनसे २०० से ३०० % तक लाभांश कमाते हैं मगर इन्हें बनाने वालों के साथ गुलाम जैसा व्यवहार किया जाता है । स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिक्कूल प्रभाव डालने वाला यह काम उन नन्हे बच्चों की मज़बूरी बन जाता है । मां-बाप व खुद का पेट पालने के लिए बचपन के साथ अपने स्वास्थ्य का भी सौदा उन्हें करना पड़्ता है । क्योंकि कालीन बुनते समय उड़्ने वाली धूल और रेशों के कण सांसों के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते हैं जिससे इन बच्चों को फेफड़ों की बीमारियां हो जाती है ।
इनसे निजाद पाने के लिए ही बालश्रम कानून १९८६ में आया जिसके अनुसार १४ साल से कम उम्र के बच्चे खतरनाक माने जाने वाले उधौगों में काम नहीं कर सकते । संविधान के ”फैक्ट्रीज एक्ट” में खतरनाक उधौगों की परिभाषा के अनुसार बीड़ी बनाना, कालीन बुनना,सीमेंट बनाना और उनकी बोरियां भरना,कपड़ा छ्पाई,दियासलाई, विस्फोटक और आतिशबाज़ी का निर्माण, चमड़ा,साबुन का निर्माण और उनका शोधन , ऊन की सफाई एंव भवन निर्माण हैं । सर्वोच्च न्यायालय ने इसको आधार मानकर १० अक्तूबर २००६ को अधिसूचना जारी कर सभी प्रकार के कारखानों व प्रतिष्ठानों में बच्चों के काम करने पर रोक लगा दी ।
क्योंकि बाल मज़दूरों का शोषण प्रायः उन सभी देशों में हो रहा है जहां उनकी थोड़ी बहुत उपयोगिता की गुंजाइश है । सरकार ने बाल मज़दूरों के शोषण रोकने के लिए कई कानून बनाए हैं मगर यह सब महज़ कागज़ी प्रतीत होते हैं । १९६१ के प्रशिक्षणार्थी अधिनियम के अनुसार १४ वर्ष या इससे कम उम्र के बच्चों को व्यावसायिक प्रशिक्षण नहीं दिया जासकता, लेकिन हाथकरघा और कुटीर उधौगों में ऐसे बच्चे कार्यरत हैं । बाल मज़दूर अधिनियम १९८६, बच्चों की कार्यावधि १२ से १६ घंटे से घटाकर उन्हें पढ़्ने की सुविधाएं देने तथा नहीं के बराबर मिलने वाली मज़दूरी को बढ़ाता है ।
विश्व में अस्त्रों और सैनिक व्यवस्था पर जितना खर्च हो रहा है यदि उसे स्त्रियों और बच्चों को समुचित आहार देने ,बच्चे के जन्म से पहले मां की देखरेख ,बच्चों की प्राथमिक शिक्षा , सफाई आदि पर खर्च किया जाए तो दुनियां के ५० करोड़ स्त्री व बच्चों को राहत मिल सकती है । बच्चों से कमाई करवाने के बजाए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम से लाभ उठा मां - बाप को खुद काम करने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए ।
बालश्रम अधिनियम के तहत बालश्रमिक रखने वाले प्रतिष्ठानों पर १० हज़ार का अर्थदंड और एक से छः माह की जेल का प्रावधान है । लेकिन सरकार के प्रयासों को सफल बनाने के लिए जनता की भागीदारी अतिआवश्यक है । इसके लिए आइये १४ नवम्बर ”बाल दिवस” के दिन हम यह प्रण करते हैं कि बाल शोषण न करेंगे न करने देंगे ।




8 comments:

  1. बेहद मार्मिक स्थिति
    अच्छा आलेख

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  2. बाल दिवस मनाने से किसी बच्चे का भला नहीं होता
    बड़ी दयनीय स्थिति है

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  3. जहां भी हाथ रखो वहीँ फफोला है इसके लिए सरकारें तो हैं ही हम आम लोग भी कम जिम्मेदार नहीं हैं क्या हम देख पा रहे हैं कि हम क्या करते हैं ... किसलिए दीवाली पर यह आतिशबाजी और मिठाई का वितरण ... किसलिए विवाह शादियों पर इतने इतने स्टाल .. किसलिए यह दिखावे और शानोशोकत.. आप और मैं इस मामले
    में जो कर सकते हैं वह है सीधे लौकी कि सादगी में जीना शुरू कर दें ..आज कि तारीख में एक आदमी जो सबसे अच्छा काम कर रहा है , /भीतर के हालत मैं नहीं जानता ,/वह है रामदेव लेकिन पता नहीं कब तक ? इस समाज में बहुत कुछ एक साथ बदलने कि जरूरत आन पड़ी है .. शादी ब्याह खानदान परिवार को जड़ मूल से विदा होना होगा .. दुःख से मुक्त सुख कि तलाश करनी होगी भले ही वह थोडा फीका हो भले ही उसमे चमक न हो .. यदि हम ऐसा नहीं कर पाए तो अधिक दूर नहीं है कि यह शोषित वर्ग हमें अपने आप को बदलने के लिए विवश कर दे और वह बहुत महंगा सौदा होगा ..एक नए दुष्चक्र में फंसना होगा
    इससे पहले कि हो चुकी हो बहुत देर / इससे पहले कि वे तुम्हे टुकड़ा टुकड़ा बाँट चुके हों खेमों में इससे पहले कि तुम्हारे औंधे पड़े जिस्म को मरा समझ गिद्ध बुनने लगें दावतें उठो तोडो ये अपनी सदियों लंबी आत्मघाती नींद साधो असंभव कि छाती पर सम्भावनाओं कि लय ताल .. इससे पहले कि हो चुकी हो बहुत देर

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  4. हर नागरिक का कर्त्तव्य है - याद दिलाने तथा आलेख के लिए आभार और धन्यवाद्

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